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दुर्ग वन मण्‍डल

  • दुर्ग वन मण्‍डल 20’23 से 22’02 से 81’58 पूर्व देशांतर के मध्‍य स्‍थि‍त है । कुल वन क्षेत्र 748.01 वर्ग कि.मी. है। कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 8.95 प्रति‍शत दुर्ग जि‍ले में है। कुल भौगोलि‍क क्षेत्रफल 8537 वर्ग कि‍.मी. का 8.95%  वनक्षेत्र के अन्‍तर्गत केवल बालोद, डौण्‍डीलोहारा एवं गुरुर तहसील में फैला है।
  • बालोद एवं दल्‍ली वनक्षेत्र में वर्ष 1893 से वैज्ञानि‍क एवं क्रमबद्व कटाई प्रारंभ हुई। वर्ष 1915- 16 से अब तक कार्यशील कार्य आयोजना के तहत् कार्य सम्‍पादि‍त कि‍ये गये।
  • रि‍सायतों के वि‍लीनीकरण से पहले भूतपूर्व कवर्धा रि‍यासत के वन दो वर्गो में बंटे हुये थे। रि‍यासती वन एवं नि‍स्‍तारी वन। भारतीय वन अधि‍नि‍यम सन् 1927 द्वारा दि‍नांक 20 अक्‍टूबर 1949 में उन वनों को आरक्षि‍त वन घोषि‍त कि‍या।
  • यहां मुख्‍यत:  शुष्‍क पर्णवाती वन है। ये वन ‘’दक्षि‍ण मि‍श्रि‍त पर्णपाती वन’’ है। कुछ सीमि‍त क्षेत्रों में सागौन वन भी है।
  • वर्ष 1978-79 से श्री आई. सी. गोयल की कार्ययोजना प्रचलि‍त है। इसकी अवधि‍ 30 जून 2009 तक वि‍स्‍तारि‍त की गई है। कार्य आयोजना में कुल वनक्षेत्र 845.61 वर्ग कि‍.मी. है। क्रि‍यान्‍वयन अवधि‍ में राजनांदगांव वन मण्‍डल को कुल 79.61 वर्ग कि‍.मी. हस्‍तांतरि‍त कि‍या गया। निर्वनीकरण वन क्षेत्र (1976 वन व्‍यवस्‍थापन से) 1.36 वर्ग कि‍.मी. घटाया गया है।
  • वर्तमान में दुर्ग वन मण्‍डल में श्री आर. के. टान्‍टा (भा.व.सेवा) के द्वारा पुर्नरीक्षि‍त कार्य आयोजना प्रचलि‍त है। दुर्ग मण्‍डल में मुख्‍यत: मि‍श्रि‍त वन उपलब्‍ध है जैसे:-
  • उच्‍च स्‍तरीय वृक्ष:- मि‍श्रि‍त वनों की मुख्‍त प्रजाति‍यों में साजा, बीज, धावडा, सेन्‍हा, धोबनी, सलई, मोदे, मुण्‍डी, कुसुम, भिर्रा, कर्रा, महुआ, आंवला, अमलतास, बेल, ति‍न्‍सा, बहेडा, तेन्‍दू, भंवर साल, सागौन, हल्‍दू, काला, सि‍रस, सेमल व घांठा आदि‍ है।
  • नि‍म्‍न स्‍तरीय वृक्ष :- रोहण, खैर, लेण्‍डि‍या, पापड, पलास, धामन, कुम्‍भी, भेलवा, गि‍रची, ककई, बांस, गि‍रची आदि‍ पाये जाते हैं।
  • नि‍म्‍न रोह :- सामान्‍यत: कोरई, हरसि‍गंर, धवई, छींद, मरोडफली गुरसकरी, वन तुलसी, मकोई, बेर, चरोटा, चि‍रचि‍टा एवं लेण्‍टाना पाये जाते है।
  • घांस :- इस क्षेत्र में सामान्‍यत: भुरभुसी, शुक्‍लाघास, सावन, फुलबहरी, कांटाबहरी, छींद घांस, मुंज कापरी, खैरसाली है। पठारों एवं खुले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत सघन घांस पाई जाती है ।
  • बेलाऍ :- इस क्षेत्र में सामान्‍यत: कवेटी, भाडर, चि‍लबेल, माहुलबेल, पलास, रामदातौन, दुधबेल आदि‍ बेलाऍ, पाई जाती है।
  • सागौन:- मुख्‍य सहयोगी प्रजाति‍यां- बांस, तेंदू, पलाश, आंवला, सेन्‍हा, धामन, भेल, दुधी कर्रा, घोंट आदि‍।
  • वनौधि‍यॉ :- दुर्ग वन मण्‍डल के अन्‍तर्गत नि‍म्‍नांकि‍त वनौषधि‍यां पायी जाती है खपरी, बेल, वनहि‍रबा, बनसन, बनचेंज, करूकंद, काली मूसली, केवटी, लाल बेला, बि‍च्‍छुकंद, चि‍पीबेला, चि‍रायता, भुई, नीम, भेसबेला, पाठ जडी, रक्‍तबि‍राड, रामदातौन, सफेद पेन्‍ट्रा, डोटेकंद, दशमूल, दुवि‍धा बेला, तीन फुलि‍या, तेजराज, नागरमोथा, नागजडी, अडगुड, बेला, अनन्‍तमूल, गुडसकरी, ऐंठमुर्री, खुडूरबेला, ढाढरबेला, बनहल्‍दी, बन आंवला, कचरीबेला, चि‍पीबेला, भोहटीबेला, सटफोक, सूपली, सि‍गांर, गुरबेल, गुलनबन बेल, बकली, कुकूरकंद, मढेला पीडहर, मनि‍हर, चि‍तावर, भेसखुडर, फांगबेला, गंगगुला, बायबि‍डंग, केवटी लाल बेला, भुई, आंवला, पताल, कूम्‍हडा, सतावरी, दशमूल, नागर मोथा, लाजवंती आदि‍।
  • वन्‍य प्राणी संरक्षण :- वन प्रबंधन का मुख्‍य उद्देश्‍य परि‍स्‍थि‍ति‍कीय संतुलन बनये रखना तथा पर्यावरणीय स्‍थायि‍त्‍व का अनुरक्षण एवं रख-रखाव करना है।
  • वन्‍य प्राणी संरक्षण अधि‍नि‍यम म.प्र. में भारत सरकार कृषि‍ वि‍भाग की अधि‍सूचना क्रमांक जी.एस.आर. 28 ई. दि‍नांक 25 जनवरी 1973 से प्रवृत्त हुआ है।
  • पूर्व में भारत में वाल्‍ड बर्ड्स एण्‍ड एनीमल्‍स प्रोटेक्‍शन एक्‍ट 1912 प्रवृत्त था, कि‍न्‍तु यह अधि‍क प्रभावी नही हुआ। इस कारण बदली हुई परि‍‍स्‍थि‍ति‍यॉ को देखते हुये भारत सरकार ने वर्ष 1972 में नवीन वि‍धान ‘’वन्‍य प्राणी संरक्षण अधि‍नि‍यम 1972”  अधि‍नि‍यमि‍त कि‍या।
  • अधि‍नि‍यम के तहत् प्रथम अनुसूची में 70 स्‍तनधारी 22 सरीसृप एवं भूजल प्राणी 41 पक्षि‍यों को दुलर्भ एवं संकट ग्रस्‍त प्राणी घोषि‍त कि‍या गया।
  • दुर्ग वन मण्‍डल के अन्‍तर्गत कोई अभ्‍यारण्‍य स्‍थि‍त नहीं है। इससे अन्‍य अभ्‍याण्‍यों की अथवा राष्‍ट्रीय पार्क क्षेत्र की सीमा भी लगी नहीं है।
  • म.प्र. शासन वन वि‍भाग के पत्र क्रमांक 14/03/75/10/03 दि‍नांक 25/04/1978 द्वारा शि‍कार की सूचना देने वाले व्‍यक्‍ति‍ को नगद ईनाम देने के नि‍यम बनाये गये है।
  • राज्‍य शासन द्वारा हिंसक वन्‍य प्राणि‍यों शेर, तेन्‍दुआ, भालू, लकडबग्‍घा, भेडि‍या जंगली सूअर, गौर, जंगली हाथी, जंगली कुत्ता, मगरमच्‍छ, घडि‍याल, वनभैंसा एवं सि‍यार द्वारा पशुओं एवं मनुष्‍यों को क्षति‍ पहूंचाये जाने पर वर्तमान में जनहानि‍ में 100000/- स्‍थायी रूप से अपंग होने पर 20000/- एवं घायल होने पर 7500/- की अधि‍कतम सीमा तक पशुहानि‍ में 5000/- की अधि‍कतम सीमा तथा क्षति‍पूर्ति‍ राशि‍ देने का प्रावधान रखा गया है।

*(संदर्भ): 100 कदम शतायु दुर्ग: 1906-2006